सृष्टि की रचना कैसे हुई

कई अरब वर्षों पहले इस पुरे ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं था या यूं कहें पूरा ब्रह्मांड ही नहीं था | नहीं कोई प्रकाश न ही कोई तेज,पर्वत पृथ्वी,आकाश,जल,वायु कुछ भी नहीं यहाँ तक कोई देवी देवता भी नहीं थे| ना ही कोई ग्रह नक्षत्र ,पूरे ब्रहमांड में अंधेरा था नाहीं सूर्य दिखाई देता नहीं चंद्रमा,अन्य ग्रहों का भी पता नाहीं चलता   तब उस  समय अचानक एक चमकते हुए बिंदु की उत्पत्ति हुई | फिर उसके अंदर से भयानक अग्नि का परिवर्तन आने लगा तभी इस बिंदु के अंदर से होने वाले विस्फोटक से सृस्टि की रचना हुई । शिव पुराण की मानयता के अनुशार  बिंदु के मिलन से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई | तब उस विस्फोटक से माँ अदि सकती सक्ति जगदम्बा का जन्म हुआ और उन्होने सर्व प्रथम शिव को जन्म दिया | ये वही व हैं जिनके बारे में वेद पुराण और शास्त्रों में सुनने को मिलता है जो निरंकार और अपार सक्ति से निर्मित है | एक बार शिजी के मन में सृष्टि रचना की इच्छा हो उन्होंने सोचा कि मैं एक से अधिक रूप बनालूँ |यह विचार आते ही माँ आदि  सक्ति से आदेश माँगा | आदि सकती से आदेश लेकर शिव शिव ने अपने दाये अंडकोष पर अमृत मल दिया वहां से तत्काल ही एक दिव्पुरुष का जन्म हुआ जिसका रूप अति दिव्य था उसमें सदगुण की संपन्नता था | और वह सागर तरल की तरह गंभीर था उसके चार हाथ में शंख चक्र गदा पद्म सुशोभित थे उस समय से उसका नाम विष्णु रखा | शिव के आदेश से उनको सृष्टि पालनकर्ता बनाया गया तब शिव ने कहा इस समय तुम कठोर तप करो | भगवान विष्णु के लगातार तप करने से उनकी नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ तभी तभी शिव ने अपने दाहिने अंग से विचित्र रूप वाले ब्रह्मा को प्रकट करके कमल पर बैठा दिया उस समय ब्रह्मा और विष्णु दोनों आपस दोनों अपने ध्यान और तक में लीन थे कई वर्षों बाद अपनी साधना से जागने के पश्चात वे एक दूसरे के सामने प्रकट हुए तब वह एक दूसरे से परिचित नहीं थे | इसी कारण उन दोनों में विवाद छिड़ गया तभी माँ आदि सक्ति ने आकर उनका विवाद शांत किया फिर एक दूसरे से परिचय करवाया और आदेश दिया कि ब्रम्हा आप सृष्टि की रचना करोगे और ब्रह्मा  से कहा आप सृस्टि का पालन करोगे और शिव संहारकरता  होंगे | इस के बाद ब्रम्हा ने पंच तत्व -अग्नि, जल,वायु ,पृथ्वी,आकाश की रचना की उसके पश्चात सूर्य,चंद्र एवं अन्य ग्रह नक्षत्रो की भी रचना की उस समय पृथ्वी पर कोई जीवन नहीं था | तब भगवान ब्रह्मा
ने अपनी योग विद्या से कई पुत्रो और पुत्रियो को जन्म दिया |

ब्रह्मा ने अपने मन से मारिचि, नेत्र से अत्रि, मुख से अंगिरस, कान से पुलस्त्य, नाभि से पुलह, हाथ से कृतु, त्वचा से भृगु, प्राण से वशिष्ठ, अंगुषठ से दक्ष, छाया से कंदर्भ, गोद से नारद, इच्छा से सनक, सनन्दन, सनातन, सनतकुमार, ध्यान से चित्रगुप्त आदि को जन्म दिया | 

प्रजापति की दो पत्नियां थीं प्रसूति और वीरणी। प्रसूति से दक्ष की 24 पुत्रियाँ और वीरणी से 60 पुत्रियाँ। इस तरह दक्ष की 84 पुत्रियां थीं। समस्त दैत्य, गंधर्व, अप्सराएं, पक्षी, पशु सब सृष्टि इन्हीं कन्याओं से उत्पन्न हुई। दक्ष की ये सभी कन्याएं, देवी, यक्षिणी, पिशाचिनी आदि कहलाईं। प्रसूति से दक्ष की चौबीस पुत्रियाँ हुई ,श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, कृति, बुद्धि, लज्जा, वपु, शांति, सिद्धि, कीर्ति,    ख्याति,स्मृति,क्षमा,सती,क्रिया,सम्भूति,सन्नति,अनुसूया,उर्जा,स्वाहा, स्वधा | श्रद्धा ,धृति ,तुष्टि पुष्टि,मेधा ,क्रिया
,बुद्धि ,लज्जा ,वपु ,शांति ,सिद्धि ,कीर्ति ये सब धर्म से विवाहित थे |

ख्याति के पति महर्षि भृगु ; सती के पति रूद्र ; लक्ष्मी के पति विष्णु  ; स्मृति के पति महर्षि अंगीरस;सम्भूति के पति महर्षि मरीचि ; प्रीति के पति महर्षि पुलत्स्य ; क्षमा के पति महर्षि पुलह ;सन्नति के पति कृतु; अनुसूया के पति महर्षि अत्रि; उर्जा के पति महर्षि वशिष्ठ ; स्वाहा के पति अग्नि ; स्वधा के पति पितृस |

वीरणी से दक्ष की 60 पुत्रियाँ और उनके पति -

मरुवती ,वसु ,जामी ,लंबा ,भानु ,अरुंधती ,संकल्प ,महूर्त संध्या ,विश्वा ये सब धर्म से विवाहित थे;

अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्ठा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सरमा और तिमि ये सब महर्षि कश्यप से विवाहित थे | अदितिसे आदित्य (देवता), दिति से दैत्य, दनु से दानव, काष्ठा से अश्व आदि, अरिष्ठा से गंधर्व, सुरसा से राक्षस, इा से वृक्ष, मुनि से अप्सरागण, क्रोधवशा से सर्प, ताम्रा से श्येन-गृध्र आदि, सुरभि से गौ और महिष, सरमा से श्वापद (हिंस्त्र पशु) और तिमि से यादोगण (जलजंतु) हुए |

कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, सुन्रिता, पुष्य, अश्लेषा, मेघा, स्वाति, चित्रा, फाल्गुनी, हस्ता, राधा, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मुला, अषाढ़, अभिजीत, श्रावण, सर्विष्ठ, सताभिषक, प्रोष्ठस, रेवती, अश्वयुज, भरणी यह सब चंद्रदेव से विहावित थे | इन कन्याओं नक्षत्र कन्याएं भी कहा जाता हैं। हालांकि अभिजीत को मिलाकर कुल 28 नक्षत्र माने गए हैं |

बाकी बची 9 कन्याओं का विवाह- रति का कामदेव से, स्वरूपा का भूत से, स्वधा का अंगिरा प्रजापति से, अर्चि और दिशाना का कृशश्वा से, विनीता, कद्रू, पतंगी और यामिनी का तार्क्ष्य कश्यप से। इनमें से विनीता से गरूड़ और अरुण, कद्रू से नाग, पतंगी से पतंग और यामिनी से शलभ उत्पन्न हुए। इसी प्रकार राक्षसों को निवास के लिए पाताल ,देवों के लिए स्वर्ग ,मनुष्यों के लिए पृथ्वी, पक्षियों के लिए आकाश ,जंगलीजीवो को पृथ्वी पर जंगल , समुद्री जीवो के लिए समुद्र मिला |

जैसे की इंद्रा और बाकि देवताओ को स्वर्ग मिला साथ ही इंद्र ने मनोरंजन के लिए ब्रह्मा से कहकर अप्सराओ का निर्माण करवाया जैसे कि-  रम्भा ,मेनका ,उर्वशी ,तिलोत्तमा ,घृताची ,मेनका पुत्री (सकुंतला) अदि जो की दिखने में अति सुन्दर, किसी को भी कामवश करने में सक्षम थीं | और गायको के लिए गंदर्व का निर्माण किया जो स्वर्ग में गीत और संगीत करते थे |

समय के चलते ही भगवानों और ऋषि मुनियों ने अलग-अलग अवतार लेकर के राक्षसो का वध किया और वंश  और पडी को आगे बढ़ाया |हम मनुष्यों की जात से गौत्र पता चलता है |और गौत्र से हम किस के वंशज है इस का पता चलता है |

                                                         धन्यवाद्

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